स्त्रियों के सोलह श्रृंगार

types of makeup

प्राचीन काल से ही रूपसियों के सोलह श्रृंगार को प्रमुखता दी जाती रही है। ये सोलह श्रृंगार इस प्रकार हैं:

मेंहदी

श्रृंगार कि बात हो और मेंहदी न रचाई जाय, ऐसा हो ही नहीं सकता, हथेली बढ़ाई जाएगी धीरे-धीरे होंठों तक…तब गोरी-गोरी हथेलियों में सुर्ख  लाल मेहंदी ही तो रंग लाएगी, मेहंदी का उपयोग हथेलियों व नाखून रंगने के लिए किया जाता था |

मालिश

मालिश से रक्त संचार प्रबल होता है और सुंदरता में निखार आता है। प्राचीन समय से ही सुगंधित तेलों से सम्पूर्ण देह की मालिश की जाती थी।

फेस पैक व उबटन

शरीर की सुंदरता व कोहनी तथा पैरों की कोमलता के लिए विभिन्न प्राकृतिक उबटनों का प्रयोग किया जाता था। चोकरयुक्त आटा, पीली सरसों का तेल तथा चुटकी भर हल्दी का उबटन सर्वाधिक प्रसिद्ध था। फेस पैक– चेहरे की रंगत निखारने के लिए चंदन, मुलतानी मिट्टी व गुलाब जल के मिश्रण का प्रयोग किया जाता था।

स्नान

श्रृंगार में स्नान तो जरूरी है ही शारीरिक स्वच्छता के लिए भी यह आवश्यक है। जल में सुगंधित पुष्प, चंदन, केसर आदि डाल कर स्नान करने की परपंरा रही है। रानियाँ तो कच्चे दूध से भी स्नान करती थीं। मुलतानी मिट्टी एवं बेसन का भी उपयोग किया जाता था। इस से त्वचा की कोमलता एवं स्निग्धता बरकरार रहती थी। स्वच्छ जल में कच्चा दूध एवं गुलाब की पंखुड़ियाँ पीस कर एवं साबुत डालकर स्नान करने से तन का पोर-पोर खिल उठता है।

अंगराग

स्नान के पश्चात ‘अंगराग’ का लेपन किया जाता था। खस, तगर, गुलाब की पंखुड़ियाँ, चंदन, केसर आदि सुगंधित चीजें पीस कर देह पर लेप लगाने का वर्णन विष्णु पुराण में भी है, अंग-अंग सुगंध से भर जाए तो हर क्षण हो जाए मधुमय ।

केशसज्जा

वस्त्र पहनने के बाद केशसज्जा की बारी आती है। तरह-तरह से वेणी एवं जूड़े बनाए जाते थे। कहते हैं कि केशसज्जा की जितनी विविध किस्में प्राचीनकाल में थीं, उतनी आज भी नहीं हैं, वेणी एवं जूड़े में मोती या फूलों की माला को गूंथा या लगाया जाता था। तत्पश्चात सुहाग का प्रतीक ‘सिंदूर’ मांग में भरा जाता था ।

वस्त्र

अवसर एवं ऋतुओं के अनुसार वस्त्र पहनना भी सोलह श्रृंगार के अंतर्गत आता है। वस्त्रों में साड़ी को प्रमुखता प्राप्त थी। साड़ी के अलावा लहंगा चुन्नी भ्री.पहनी जाती थी।

कपोल तथा चिबुक

कपोल तथा चिबुक को चंदन व रंगीन द्रव्यों से सजाया जाता था, फूलपत्तियाँ बनाई जाती थीं। सुंदरता में चार चांद लगाने के लिए तिल भी लगाए जाते थे।

पैरों ko रंगना

तन के ऊपरी भाग का तो श्रृंगार हो गया, अब पैरों की बारी है। सुंदर पैरों में यदि रंगों का कमाल हो जाए तो पांवों की सुंदरता में चार चाँद लग जाएंगे, इन्हें रंगने के लिए महावर या आलता का उपयोग होता था।

जेवर पहनना

नाक को सजाने के लिए लौंग, फुली, कील, तथ नकफुली, बुलाक, नकमोती आदि होते थे। सोलह श्रृंगार में नाक में लौंग अवश्य पहनी जाती थी।

सौंदर्य में चार चाँद लगाने के लिए आभूषणों का उपयोग प्राचीनकाल में बहुतायत से होता था हर अंग को सजाने के लिए गहने होते थे। जैसे कानों को सजाने के लिए कर्णफूल, कुंडल, बुंदें, बाली, झुमका आदि। सिर को सजाने के लिए मांगटीका, सीसफूल, बेनाबेदी, झूमर, केशों में गूंथने के लिए मोतियों की लड़ियां वे जूड़े में चूड़ामणि लगाई जाती थी। इन के अलावा गले में हार, बाहों में बाजूंबंद, हाथों में चूड़ियाँ, कड़ा, उंगलियों में अंगूठी, छल्ला, आरसी इत्यादि पहने जाते थे, कमर में मेखला, कमरबंद, पैरों में पायल, कड़े, पाजेब, झांझर आदि होते थे।

होंठ

अब आती है होंठ सजाने की बारी। होंठ रंगने का शौक स्त्रियों को शुरू से ही रहा है। भारत में प्राचीनकाल से ही महिलाएं फूलों की पंखुड़ियों को सुखा कर, पीस कर उन का लेप होंठों पर किया करती थीं। लाल रंग या नंदी चूर्ण का उपयोग किया जाता था। इस रंग के जम जाने के बाद चमक लाने के लिए मोम लगाया जाता था। होंठों के इस प्रसाधन के अतिरिक्त पान खा कर भी होंठ लाल बनाए जाते थे। ‘इन खूबसूरत बंद लबों में कितनी बातें, जज्बात कैद…

अंजन

केशसज्जा के बाद आंखों की सज्जा की बारी आती है। आंखों में अंजन लगाया जाता था, जिसे घर में स्वयं तैयार किया जाता था। आज भी कुछ महिलाएं घर में ही काजल बनाती हैं, इस से आंखें स्वस्थ एवं सुंदर बनती हैं। अंजन लगाने के अलावा पलकों एवं भौंहों को भी सजाया जाता था।

बिंदी

बिंदी चंदन, लाल रंग की रोली या सिंदूर की भी लगाई जाती थी। विशेष अवसरों पर सोने-चांदी की भी बिंदी लगाई जाती थी। ये बिंदियाँ कई आकार प्रकार की होती थीं। बिंदी को टिकुली या तिलक भी कहते हैं।

फूलमाला पहनना

आभूषण पहनने के बाद महिलाएं ताजे, सुगंधित फूलों से बनी माला पहनती थीं। केशों में गजरा, गले एवं हाथों में फूलों की माला रूप-सौंदर्य में चार चाँद लगा देती है। रमणी को और गमनमोहक बना देती है। ‘हर फूल-फूल में समाई ताजगी तुम्हारी, या तुम में ही समाई फूलों की ताजगी…

कर दर्पण (आरसी)

इन सभी श्रृंगारों के बाद आरसी पहनना भी एक श्रृंगार ही था। आरसी में दर्पण जड़ा होता था, जिसमें नायिका समय-समय पर निहार कर अपना रूप संवारती थी। सोलह श्रृंगार में पान खाना भी एक श्रृंगार ही था। मन में ताजगी एवं प्रेम रस का संचार करने के लिए ही शायद पान का उपयोग किया जाता होगा। इसी पान पर तो कितने ही गीतों एवं कविताओं की रचना हुई है।

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